नई दिल्ली/हल्द्वानी। भारत को आजाद हुए 79 साल हो चुके हैं। संविधान ने हर नागरिक को समानता, सम्मान और गरिमा का अधिकार दिया है। इसके बावजूद जाति के आधार पर भेदभाव की घटनाओं के आरोप सामने आना देश के लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष एवं राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित तौर पर कार्यक्रम स्थल के “शुद्धिकरण” को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। खड़गे ने राज्यसभा में इस मुद्दे को उठाया और इसे अपमानजनक बताया। केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने मामले की जांच कराने का आश्वासन दिया है।
इस मुद्दे पर नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी सवाल उठाते हुए कहा कि दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को आखिर कब तक इस तरह के अपमान का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि जाति के आधार पर किसी का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और सरकार को जवाब देना चाहिए।
सवाल सिर्फ एक घटना का नहीं, मानसिकता का है
आजादी के बाद भारत ने संविधान को सर्वोच्च स्थान दिया। संविधान की मूल भावना समानता और सम्मान पर आधारित है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति के साथ उसकी जाति के कारण भेदभाव किए जाने का आरोप सामने आता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सामाजिक समानता की मंजिल तक पहुंचने में देश को और कितने साल लगेंगे?
राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, लेकिन असली सवाल समाज की सोच का है। मंदिर, मंच, कार्यालय या सार्वजनिक स्थान—हर जगह भारतीय नागरिक की पहचान सबसे पहले एक इंसान और संविधान के बराबर अधिकार वाले नागरिक की होनी चाहिए।
79 साल बाद भी वही सवाल क्यों?
15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था। 2026 में देश स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। ऐसे समय में जातिगत भेदभाव के आरोपों पर बहस होना यह सवाल सामने लाता है—
“आखिर वह दिन कब आएगा, जब भारत में किसी इंसान की जाति नहीं, सिर्फ इंसानियत उसकी पहचान होगी?”
भारत संविधान से चलता है, भेदभाव से नहीं। सवाल पूछना हर नागरिक का अधिकार है और समानता सुनिश्चित करना व्यवस्था की जिम्मेदारी।

